आयुष्मान के नाम पर IGIMS में खेल! बिना इलाज मरीज के नाम पर करोड़ों की हेराफेरी

  • बिना इलाज मरीज, फिर भी आयुष्मान का क्लेम!
  • IGIMS में 45 लाख के कथित फर्जीवाड़े से मचा हड़कंप, कैग की आपत्ति में 13.89 करोड़ के राजस्व नुकसान का भी मामला

पटना : गरीब मरीजों को मुफ्त और कैशलेस इलाज उपलब्ध कराने वाली आयुष्मान भारत योजना की निगरानी व्यवस्था पर पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में सामने आये मामले ने गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं. जिस मरीज ने अस्पताल की चौखट तक नहीं देखी, उसके नाम पर इलाज दर्ज कर आयुष्मान योजना में क्लेम किये जाने की शिकायत से शुरू हुई जांच अब करीब 45 लाख रुपये के कथित फर्जी क्लेम तक पहुंच गयी है. मामला सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन ने आंतरिक जांच शुरू करायी, तो आयुष्मान क्लेम की पूरी प्रक्रिया ही जांच के घेरे में आ गयी. सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मरीज का इलाज ही नहीं हुआ, तो उसके नाम पर अस्पताल के सिस्टम में इलाज कैसे दर्ज हुआ और क्लेम की प्रक्रिया किस स्तर पर आगे बढ़ी? यही वह सवाल है, जिसका जवाब अब जांच के जरिये तलाशा जा रहा है. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, मामले में आउटसोर्सिंग एजेंसी से जुड़े कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आयी है. प्राथमिकी दर्ज होने के साथ विभागीय स्तर पर भी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गयी है.

एक शिकायत ने खोल दी परत

मामले की शुरुआत एक मरीज की शिकायत से हुई. मरीज को पता चला कि उसके नाम का इस्तेमाल आयुष्मान योजना के तहत इलाज के लिए किया गया है, जबकि उसने IGIMS में इलाज कराया ही नहीं था. शिकायत मिलने के बाद अस्पताल प्रशासन ने रिकॉर्ड खंगालना शुरू किया. मरीज के उपचार से संबंधित दस्तावेज, अस्पताल के हॉस्पिटल इंफार्मेशन मैनेजमेंट सिस्टम (HIMS) और आयुष्मान क्लेम के रिकॉर्ड का मिलान किया गया. जांच में कथित तौर पर ऐसे रिकॉर्ड सामने आये, जिनमें मरीज के नाम पर उपचार और क्लेम की प्रक्रिया दर्ज थी. इसके बाद मामला सिर्फ तकनीकी त्रुटि मानकर छोड़ने के बजाय वित्तीय अनियमितता के एंगल से भी जांच के दायरे में आया.

45 लाख का कथित फर्जी क्लेम

प्रारंभिक जांच के मुताबिक करीब 45 लाख रुपये के कथित फर्जी क्लेम का मामला सामने आया है. रिपोर्टों में बताया गया है कि मरीजों के रिकॉर्ड और आयुष्मान कार्ड से संबंधित प्रक्रिया में कथित हेरफेर के आरोप लगे हैं. इस मामले में चार नामजद लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज किये जाने की जानकारी है. करीब 45 लाख रुपये की राशि की वसूली की बात भी रिपोर्टों में सामने आयी है. हालांकि, यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह राशि जांच में सामने आये कथित फर्जी क्लेम से जुड़ी है. जांच पूरी होने से पहले इसे अस्पताल में हुई कुल वित्तीय गड़बड़ी की अंतिम राशि नहीं माना जा सकता.

13.89 करोड़ का दूसरा बड़ा सवाल

मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि आयुष्मान योजना को लेकर संस्थान में एक अलग वित्तीय सवाल पहले से उठ चुका है. उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, कैग की आपत्ति में 13 करोड़ 89 लाख 47 हजार 358 रुपये के राजस्व नुकसान का मामला उठाया गया था. यह मामला समय पर प्रतिपूर्ति क्लेम नहीं किये जाने से संबंधित बताया गया है. यानी एक ओर बिना इलाज के मरीज के नाम पर कथित क्लेम का मामला सामने आया, तो दूसरी ओर संस्थान में इलाज के बाद मिलने वाली आयुष्मान राशि के दावों की समय पर प्रक्रिया पूरी नहीं होने पर करोड़ों रुपये के राजस्व का सवाल खड़ा हुआ. दोनों रकम और दोनों मामलों की प्रकृति अलग है, लेकिन दोनों ने आयुष्मान योजना के रिकॉर्ड, क्लेम और वित्तीय निगरानी की व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़े कर दिये हैं.

रिकॉर्ड में इलाज, हकीकत में मरीज गायब?

जांच का सबसे अहम हिस्सा यही है कि अस्पताल के रिकॉर्ड और वास्तविक मरीज के बीच कितना अंतर था. किसी मरीज के नाम पर आयुष्मान क्लेम तैयार होने से पहले उसके भर्ती होने, इलाज कराने, चिकित्सकीय प्रक्रिया से गुजरने और डिस्चार्ज होने का रिकॉर्ड तैयार होता है. ऐसे में अगर शिकायत सही पायी जाती है, तो जांच का दायरा केवल क्लेम बनाने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रह सकता. यह भी देखा जाना जरूरी होगा कि संबंधित रिकॉर्ड किस यूजर आइडी से तैयार हुआ, किस स्तर पर सत्यापन हुआ, किसने क्लेम को आगे बढ़ाया और भुगतान से पहले किस अधिकारी या कर्मचारी ने दस्तावेजों की जांच की. कहीं सिस्टम में दर्ज जानकारी और जमीन पर हुए इलाज के बीच निगरानी की कोई कड़ी कमजोर तो नहीं थी? यही जांच का महत्वपूर्ण बिंदु है.

अब हर सप्ताह होगी निगरानी

मामला सामने आने के बाद IGIMS प्रशासन ने आयुष्मान योजना से जुड़े कामकाज की निगरानी और सख्त करने की कवायद शुरू की है. इसके लिए नयी कार्यसमिति गठित की गयी है. चिकित्सा, वित्त, फार्मेसी और तकनीकी विभाग के अधिकारियों को इसमें शामिल किया गया है. निदेशक की अध्यक्षता में नियमित बैठक कर आयुष्मान मरीजों और क्लेम की समीक्षा की जायेगी. नयी व्यवस्था में मरीज के भर्ती होने से लेकर डिस्चार्ज तक के रिकॉर्ड का मिलान, HIMS और आयुष्मान पोर्टल के आंकड़ों की जांच, उपचार के बाद क्लेम की स्थिति तथा लंबित भुगतान की समीक्षा की जायेगी. आउटसोर्सिंग कर्मचारियों की भूमिका और उनके सिस्टम एक्सेस पर भी निगरानी का पहलू महत्वपूर्ण होगा.

अब जांच के दायरे में पूरी व्यवस्था

इस पूरे प्रकरण ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है—आखिर वह निगरानी व्यवस्था कहां थी, जो मरीज के अस्पताल आने से लेकर उसके नाम पर आयुष्मान क्लेम तक हर चरण की जांच करती है? एक शिकायत के बाद यदि कथित फर्जी क्लेम का मामला सामने आ सकता है, तो यह भी जांच का विषय है कि ऐसे कितने रिकॉर्ड नियमित जांच से बाहर रह गये. क्या केवल एक मरीज के रिकॉर्ड में गड़बड़ी थी या इससे जुड़े और मामले भी हैं, इसका जवाब विस्तृत जांच के बाद ही मिलेगा. फिलहाल अस्पताल प्रशासन ने निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की पहल की है. पुलिस और विभागीय जांच आगे बढ़ने के साथ यह स्पष्ट होना बाकी है कि कथित फर्जीवाड़े की वास्तविक राशि कितनी है, इसमें कितने लोग शामिल थे और सिस्टम में किस स्तर पर चूक हुई. आयुष्मान के नाम पर गरीब मरीजों के इलाज की व्यवस्था में यदि रिकॉर्ड ही सवालों के घेरे में आ जाये, तो जवाबदेही तय होना इस जांच का सबसे अहम परिणाम होगा.

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