मोतिहारी में 146 बोरी DAP की जब्ती पर ‘खाद का खेल’! पुलिस बोली 146 बोरी, कृषि विभाग बोला सिर्फ 5-6 बोरी का अंतर, आखिर सच किसका?

  • मोतिहारी में 146 बोरी DAP की जब्ती पर ‘खाद का खेल’! पुलिस बोली 146 बोरी, कृषि विभाग बोला सिर्फ 5-6 बोरी का अंतर, आखिर सच किसका

छौड़ादानो। खरीफ सीजन चरम पर है। खेतों में फसल तैयार खड़ी है और किसान खाद के लिए परेशान हैं। सरकारी दर पर उर्वरक मिलने का दावा भले ही लगातार किया जा रहा हो, लेकिन सीमावर्ती क्षेत्र के किसानों की जमीनी हकीकत इससे अलग है। किसानों का कहना है कि खाद के लिए उन्हें दुकानों और बाजारों की दौड़ लगानी पड़ रही है और काफी मशक्कत के बाद खाद मिलती भी है तो कई जगह निर्धारित सरकारी दर से अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। इसी बीच उर्वरक की कथित कालाबाजारी के खिलाफ कार्रवाई के दावों ने अब खुद कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बीते शुक्रवार को छौड़ादानो के आदर्श नगर स्थित एक गोदाम में पुलिस और कृषि विभाग की संयुक्त टीम ने छापेमारी की। पुलिस के अनुसार गोदाम में कालाबाजारी की नीयत से उर्वरक भंडारित किए जाने की सूचना मिली थी। कार्रवाई के दौरान 146 बोरी डीएपी बरामद की गई। पुलिस ने बरामदगी की सूचना वरीय अधिकारियों को दिए जाने की बात भी कही। लेकिन कार्रवाई के बाद जो विरोधाभास सामने आया, उसने पूरे मामले की गंभीरता बढ़ा दी। प्रखंड कृषि पदाधिकारी से जब बरामद उर्वरक के संबंध में जानकारी ली गई तो उन्होंने बताया कि जांच में महज पांच-छह बोरी का अंतर पाया गया है और इतना अंतर कोई बड़ी बात नहीं है। यानी एक ही गोदाम, एक ही छापेमारी और एक ही कार्रवाई—लेकिन बरामदगी को लेकर दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आ रही हैं। पुलिस 146 बोरी डीएपी बरामद होने की बात कह रही है, जबकि कृषि विभाग मामले को महज पांच-छह बोरी के अंतर तक सीमित बता रहा है। अब सवाल यह है कि आखिर सच क्या है? यदि पुलिस का 146 बोरी डीएपी बरामदगी का दावा सही है तो फिर इतनी बड़ी मात्रा में उर्वरक मिलने के बाद कार्रवाई किस स्तर तक पहुंची? कृषि विभाग की ओर से थाने में अब तक लिखित शिकायत क्यों नहीं दी गई? बरामद खाद की जब्ती सूची कहां है? उसका सत्यापन किस आधार पर हुआ? स्टॉक रजिस्टर में क्या दर्ज था और मौके पर कितनी खाद मिली? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए। थानाध्यक्ष प्रभात कुमार ने रविवार को बताया कि आदर्श नगर स्थित गोदाम में कालाबाजारी की नीयत से उर्वरक भंडारित किए जाने की सूचना मिल रही थी। इसी सूचना पर पुलिस और कृषि विभाग की संयुक्त टीम ने छापेमारी की थी। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि छापेमारी के दौरान 146 बोरा डीएपी बरामद हुआ था और इसकी सूचना वरीय अधिकारियों को दे दी गई थी। साथ ही उन्होंने बताया कि मामले में अभी तक कृषि विभाग की तरफ से कोई लिखित शिकायत या आवेदन थाना को नहीं मिला है। यहीं से सवाल और गहरा जाता है। यदि संयुक्त छापेमारी में 146 बोरी डीएपी बरामद हुई थी और पुलिस ने इसकी सूचना वरीय अधिकारियों तक पहुंचा दी थी, तो फिर कृषि विभाग की तरफ से आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए आवेदन क्यों नहीं दिया गया? क्या 146 बोरी डीएपी की बरामदगी इतनी सामान्य बात है कि मामला विभागीय कागजी कार्रवाई तक भी नहीं पहुंचा? दूसरी ओर कृषि विभाग का कहना है कि सिर्फ पांच-छह बोरी का अंतर है। यदि यही वास्तविक स्थिति है तो पुलिस द्वारा बताई गई 146 बोरी की बरामदगी का क्या अर्थ है? क्या पुलिस और कृषि विभाग ने एक ही गोदाम में अलग-अलग स्टॉक देखा? क्या जांच की प्रक्रिया में कोई गंभीर चूक हुई? या फिर दोनों विभागों के बीच समन्वय का अभाव इतना गहरा है कि एक ही कार्रवाई की दो अलग-अलग कहानी सामने आ रही है? यह विरोधाभास ऐसे समय सामने आया है जब किसान खाद के लिए परेशान हैं। सरकार उर्वरक की उपलब्धता और कालाबाजारी रोकने को लेकर सख्ती की बात करती है। अधिकारी छापेमारी और निगरानी की बात करते हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर यदि बड़ी मात्रा में खाद की बरामदगी के बाद भी कार्रवाई को लेकर तस्वीर साफ नहीं हो पा रही है, तो इसका सीधा असर किसानों के भरोसे पर पड़ता है। मामले में जिला कृषि पदाधिकारी से संपर्क कर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन फोन रिसीव नहीं होने के कारण उनका पक्ष सामने नहीं आ सका। अनुमंडल कृषि पदाधिकारी निर्भय कुमार मिश्र ने बताया कि वे फिलहाल अनुमंडल में मौजूद नहीं हैं और सूचना विभाग के कार्यक्रम के सिलसिले में पटना गए हुए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि 146 बोरी डीएपी वास्तव में बरामद हुई थी या नहीं? यदि हुई थी तो उसका आधिकारिक रिकॉर्ड क्या है? यदि नहीं हुई थी तो पुलिस ने 146 बोरी की बरामदगी की बात किस आधार पर कही? और यदि बरामदगी हुई थी तो कृषि विभाग इसे पांच-छह बोरी के अंतर तक क्यों सीमित कर रहा है? मामला सिर्फ आंकड़ों के अंतर का नहीं है। यह सरकारी उर्वरक की निगरानी, कालाबाजारी रोकने की कार्रवाई और विभागीय जवाबदेही से जुड़ा मामला है। किसानों को एक-एक बोरी खाद के लिए भटकना पड़ रहा हो और दूसरी तरफ किसी गोदाम में बड़ी मात्रा में डीएपी मिलने की पुलिस जानकारी सामने आए, फिर उसी मामले में संबंधित विभाग कार्रवाई को मामूली अंतर बताकर किनारे कर दे—तो सवाल उठना स्वाभाविक है। सबसे गंभीर बात यह है कि पुलिस और कृषि विभाग के दावों के बीच 140 से अधिक बोरियों का अंतर है। इसे महज सामान्य अंतर कहकर टालना कई अनुत्तरित सवालों को जन्म देता है। जरूरत है कि बरामदगी का वास्तविक आंकड़ा, स्टॉक रजिस्टर, खरीद-बिक्री का हिसाब, जब्ती सूची और विभागीय जांच रिपोर्ट स्पष्ट की जाए। किसानों के हक की खाद के मामले में आंकड़ों का यह विरोधाभास छोटा मामला नहीं है। या तो 146 बोरी की बरामदगी का दावा गलत है, या फिर पांच-छह बोरी के अंतर की बात पूरी कार्रवाई को बेहद हल्का कर देती है। दोनों ही परिस्थितियों में जवाबदेही तय होनी चाहिए।

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