- बेतिया राज की हजारों एकड़ जमीन पर सरकार का सबसे बड़ा फैसला: छह जिलों की 7,272 एकड़ भूमि होगी राज्य के अधीन, पूर्वी चंपारण में मालिकाना हक का रास्ता होगा आसान
पटना/मोतिहारी। बिहार सरकार ने ऐतिहासिक बेतिया राज की संपत्तियों को लेकर अब तक का सबसे बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। वर्षों से विवाद, अस्पष्ट स्वामित्व और लंबित दावों में उलझी बेतिया राज की हजारों एकड़ जमीन को अब सरकार अपने अधीन लाने जा रही है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने गोपालगंज, सारण, सीवान, पटना, पश्चिम चंपारण और पूर्वी चंपारण में फैली 7,272.16 एकड़ भूमि को बिहार सरकार में निहित (वेस्ट) करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए अधिसूचनाएं जारी कर दी गई हैं। दूसरी ओर, पूर्वी चंपारण में इन संपत्तियों के मूल्यांकन, निस्तारण और पूर्ण स्वामित्व हस्तांतरण की प्रक्रिया को गति देने के लिए जिला मूल्यांकन समिति का गठन भी कर दिया गया है। सरकार के इस फैसले को बेतिया राज की संपत्तियों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। माना जा रहा है कि इससे वर्षों से लंबित मालिकाना हक, रजिस्ट्री, लीज, भूमि विवाद और राजस्व संबंधी मामलों के समाधान का रास्ता खुलेगा। साथ ही सरकार को इन संपत्तियों का योजनाबद्ध तरीके से उपयोग करने का कानूनी आधार भी मिलेगा। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव जय सिंह ने बताया कि बेतिया राज की संपत्तियों को राज्य में निहित करने के लिए जारी अधिसूचनाओं में संबंधित अंचल, मौजा, थाना संख्या, खाता संख्या, खेसरा संख्या और रकबा का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इससे पूरी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, तथ्यपरक और विधिसम्मत ढंग से संपन्न होगी।
- छह जिलों में फैली है 7,272.16 एकड़ जमीन
सरकार के आंकड़ों के अनुसार बेतिया राज की कुल 7,272.16 एकड़ भूमि छह जिलों में स्थित है। इनमें सबसे अधिक पूर्वी चंपारण में 7,194.56 एकड़ भूमि दर्ज है। इसके अलावा गोपालगंज में 35.58 एकड़, पश्चिम चंपारण में 14.77 एकड़, पटना में 11.49 एकड़, सारण में 8.47 एकड़ तथा सीवान में 7.29 एकड़ भूमि शामिल है। सरकार का कहना है कि इन ऐतिहासिक संपत्तियों का व्यवस्थित अभिलेखीकरण, संरक्षण और राज्यहित में उपयोग सुनिश्चित किया जाएगा। भविष्य में इन जमीनों का उपयोग सड़क, अस्पताल, विद्यालय, सरकारी कार्यालय, आवासीय योजनाओं और अन्य जनकल्याणकारी परियोजनाओं के लिए भी किया जा सकेगा।
- पूर्वी चंपारण में मालिकाना हक का रास्ता होगा आसान
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की बेतिया राज संपत्ति नियमावली-2026 के तहत पूर्वी चंपारण में जिला मूल्यांकन समिति का गठन किया गया है। समिति की अध्यक्षता जिलाधिकारी करेंगे। अपर समाहर्ता सदस्य होंगे, जबकि जिला अवर निबंधक को सदस्य-सह-सचिव बनाया गया है। नगर निकाय के नगर आयुक्त या कार्यपालक पदाधिकारी, भवन प्रमंडल के कार्यपालक अभियंता, भूमि सुधार उप समाहर्ता, संबंधित अवर निबंधक और अंचलाधिकारी भी समिति में शामिल किए गए हैं। समिति का मुख्य कार्य बेतिया राज की संपत्तियों का मूल्यांकन करना, पूर्ण स्वामित्व हस्तांतरण के लिए देय राशि तय करना तथा नियमावली के अनुरूप संपत्तियों के निस्तारण और प्रबंधन की प्रक्रिया को पूरा करना होगा। इससे वर्षों से अटके मामलों के समाधान में तेजी आने की उम्मीद है।
- 26 अंचलों में चिन्हित हुई हजारों एकड़ जमीन
पूर्वी चंपारण में बेतिया राज की जमीन का सर्वेक्षण लगभग पूरा हो चुका है। राजस्व विभाग के अनुसार जिले के 26 अंचलों में 7,640.91 एकड़ भूमि की पहचान की गई है। वर्ष 2017 में जिले में 5,320.48 एकड़ भूमि दर्ज थी, लेकिन वर्ष 2024-25 के सर्वेक्षण में 2,251.47 एकड़ नई भूमि की पहचान होने के बाद कुल रकबा बढ़ गया। अमीनों द्वारा 5,389.44 एकड़ भूमि का भौतिक सत्यापन भी किया जा चुका है। नए सर्वे में खतियान, रजिस्ट्री और अन्य अभिलेखों के आधार पर कई नई जमीनों को बेतिया राज की संपत्ति के रूप में चिन्हित किया गया है। सबसे अधिक 1,093.47 एकड़ भूमि मोतिहारी अंचल में दर्ज की गई है। इसके बाद रामगढ़वा (996.32 एकड़), तुरकौलिया (783.40 एकड़), हरसिद्धि (617.71 एकड़) और सुगौली (507.38 एकड़) में बड़ी मात्रा में बेतिया राज की जमीन पाई गई है। नए सर्वे में पहली बार मधुबन अंचल में भी बेतिया राज की भूमि मिलने के बाद अब जिले के सभी 26 अंचलों में इसकी संपत्तियां दर्ज हो चुकी हैं।
- राजपत्र में प्रकाशन के साथ लागू होगी अधिसूचना
सचिव जय सिंह ने स्पष्ट किया कि जारी सभी अधिसूचनाएं राजपत्र में प्रकाशित होने की तिथि से प्रभावी होंगी। इसके बाद संबंधित जिलों में नियमावली के अनुरूप सभी प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई की जाएगी। जिला स्तर पर गठित समितियां भूमि का मूल्यांकन, अभिलेखों का सत्यापन और स्वामित्व हस्तांतरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएंगी। बेतिया राज की संपत्तियों को लेकर सरकार की यह पहल न केवल भूमि प्रबंधन को पारदर्शी बनाएगी, बल्कि दशकों से लंबित स्वामित्व विवादों के समाधान, सरकारी परिसंपत्तियों के संरक्षण और विकास योजनाओं के विस्तार की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकती है।
