“रेबीज का खतरा, वैक्सीन गायब: क्या किसी की मौत के बाद ही जागेगा स्वास्थ्य विभाग?”

  • “रेबीज का खतरा, वैक्सीन गायब: क्या किसी की मौत के बाद ही जागेगा स्वास्थ्य विभाग?”

 

छौड़ादानो/रक्सौल/आदापुर। राजेश कुमार सिंह। पूर्वी चंपारण के सीमावर्ती इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था की एक ऐसी भयावह तस्वीर सामने आई है, जिसने हजारों लोगों को भय, असुरक्षा और अनिश्चितता के बीच जीने को मजबूर कर दिया है। नेपाल सीमा से सटे रक्सौल, आदापुर, छौड़ादानो और आसपास के क्षेत्रों में रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी से बचाने वाली एंटी रेबीज वैक्सीन (एआरवी) की भारी किल्लत ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि कुत्ते, बिल्ली, बंदर, सियार, गीदड़ और अन्य संदिग्ध जानवरों के काटने के बाद लोग अस्पतालों की चौखट पर जीवन की उम्मीद लेकर पहुंच रहे हैं, लेकिन वहां उन्हें इलाज नहीं, बल्कि निराशा मिल रही है। सरकारी अस्पतालों में वैक्सीन नहीं है, निजी अस्पतालों में सीमित उपलब्धता है और दवा दुकानों पर या तो स्टॉक खत्म है या फिर मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाकर मनमानी कीमतें वसूली जा रही हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह संकट किसी सामान्य दवा का नहीं, बल्कि उस वैक्सीन का है जो रेबीज जैसी लगभग सौ प्रतिशत घातक बीमारी से बचाव का एकमात्र प्रभावी साधन मानी जाती है। चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से कहता है कि रेबीज के लक्षण एक बार शरीर में विकसित हो जाने के बाद मरीज को बचा पाना लगभग असंभव होता है। यानी इस बीमारी में इलाज से अधिक महत्वपूर्ण समय पर बचाव है। लेकिन जब बचाव का साधन ही अस्पतालों से गायब हो जाए तो यह स्थिति केवल दवा की कमी नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की संवेदनहीनता और लापरवाही की कहानी बन जाती है। सीमावर्ती क्षेत्र के गांवों में आवारा कुत्तों और अन्य जानवरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। खेतों में काम करने वाले किसान, स्कूल आने-जाने वाले बच्चे, सड़कों पर चलने वाले राहगीर और घरों के बाहर खेलने वाले मासूम अक्सर इन जानवरों के हमलों का शिकार होते हैं। हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग पशुओं के काटने की घटनाओं के बाद अस्पताल पहुंचते हैं। ऐसे क्षेत्र में एंटी रेबीज वैक्सीन का पर्याप्त भंडारण होना प्राथमिक आवश्यकता मानी जाती है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस इलाके में इसकी सबसे अधिक जरूरत है, वहीं इसकी सबसे अधिक कमी देखने को मिल रही है। ग्रामीणों का कहना है कि कई लोग पिछले दिनों कुत्ते और बंदर के काटने के बाद अस्पताल पहुंचे, लेकिन उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। कुछ लोग रक्सौल से मोतिहारी तक भटके, तो कुछ ने निजी अस्पतालों का दरवाजा खटखटाया। कई परिवारों ने मजबूरी में महंगे दामों पर वैक्सीन खरीदने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें पूरा कोर्स तक उपलब्ध नहीं हो सका। गरीब और मजदूर तबके के लोगों के सामने तो और भी गंभीर संकट खड़ा हो गया है, क्योंकि निजी अस्पतालों और मेडिकल दुकानों का खर्च उठाना उनके लिए आसान नहीं है। छौड़ादानो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. एजाज अहमद ने स्वीकार किया है कि पिछले दस से पंद्रह दिनों से जिला स्तर से एंटी रेबीज वैक्सीन का आवंटन नहीं मिला है। परिणामस्वरूप अस्पताल का स्टॉक समाप्त हो गया है। वहीं आदापुर पीएचसी के चिकित्सक डॉ. संतोष कुमार ने भी माना कि जहां से जिले को वैक्सीन उपलब्ध कराई जाती है, वहीं स्टॉक नहीं है। इसका सीधा असर सीमावर्ती इलाकों के अस्पतालों पर पड़ा है और मरीजों को परेशानी झेलनी पड़ रही है।बयह स्वीकारोक्ति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। यदि जिला स्तर पर वैक्सीन खत्म होने की स्थिति थी तो समय रहते इसकी वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? जब यह सर्वविदित है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में पशुओं के काटने की घटनाएं आम हैं, तब जीवनरक्षक वैक्सीन का पर्याप्त भंडारण सुनिश्चित क्यों नहीं किया गया? क्या स्वास्थ्य विभाग को तब तक इंतजार था जब तक अस्पतालों का स्टॉक पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाए? और सबसे बड़ा सवाल यह कि यदि इस दौरान किसी मरीज की जान पर बन आती है तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? रेबीज एक ऐसा वायरल संक्रमण है जो संक्रमित जानवरों की लार के माध्यम से फैलता है। किसी संक्रमित कुत्ते, बिल्ली, बंदर, सियार या गीदड़ के काटने अथवा खरोंचने पर वायरस शरीर में प्रवेश कर जाता है। धीरे-धीरे यह तंत्रिका तंत्र के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुंचता है और व्यक्ति को मौत के मुंह में धकेल देता है। शुरुआती लक्षण सामान्य बुखार, सिरदर्द और कमजोरी जैसे होते हैं, लेकिन बाद में पानी से डर लगना, गले में ऐंठन, मानसिक असंतुलन, लकवा और सांस लेने में कठिनाई जैसी गंभीर स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं। चिकित्सा जगत में यह स्थापित तथ्य है कि एक बार रेबीज के गंभीर लक्षण दिखाई देने लगें तो मरीज का बचना लगभग असंभव हो जाता है। यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन और चिकित्सा विशेषज्ञ पशु के काटने के तुरंत बाद एंटी रेबीज वैक्सीन लगवाने पर जोर देते हैं। प्रभावित स्थान को साबुन और बहते पानी से अच्छी तरह धोने के बाद तत्काल पोस्ट एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (पीईपी) शुरू किया जाना चाहिए। लेकिन पूर्वी चंपारण के सीमावर्ती इलाकों में इस समय सबसे बड़ा संकट यही है कि अस्पतालों में पीईपी के लिए जरूरी वैक्सीन ही उपलब्ध नहीं है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से अक्सर बेहतर चिकित्सा सुविधाओं, दवा उपलब्धता और जनस्वास्थ्य सेवाओं के दावे किए जाते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। जिस बीमारी में समय पर टीका नहीं मिलने का मतलब मौत का खतरा हो सकता है, उस बीमारी की वैक्सीन का कई दिनों तक अस्पतालों से गायब रहना स्वास्थ्य प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। मोतिहारी के सिविल सर्जन डॉ. दिलीप कुमार ने भी स्वीकार किया है कि जिले में एंटी रेबीज वैक्सीन न के बराबर उपलब्ध है। उन्होंने बताया कि विभाग से नई आपूर्ति की मांग की गई है और जल्द वैक्सीन मिलने की उम्मीद है। लेकिन जनता के मन में सवाल यह है कि जब तक नई खेप नहीं आती, तब तक जिन लोगों को आज या कल कोई संदिग्ध जानवर काट ले, उनका क्या होगा? क्या वे इंतजार करें? क्या वे महंगे निजी इलाज का सहारा लें? या फिर अपनी किस्मत के भरोसे बैठ जाएं? सीमावर्ती इलाकों में अब यह चर्चा खुलकर होने लगी है कि स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकताओं में आखिर आम लोगों की जान की कीमत कितनी है। लोग पूछ रहे हैं कि यदि किसी अस्पताल में दर्द की गोली या सामान्य दवा नहीं हो तो उसे लापरवाही कहा जा सकता है, लेकिन यदि रेबीज जैसी घातक बीमारी से बचाने वाली वैक्सीन ही उपलब्ध न हो तो उसे क्या कहा जाएगा? यह केवल आपूर्ति की समस्या नहीं, बल्कि एक ऐसे तंत्र की विफलता है जो खतरे को जानता है, जरूरत को समझता है, फिर भी समय पर तैयारी नहीं कर पाता। आज पूर्वी चंपारण का सीमावर्ती क्षेत्र एक ऐसे संकट के बीच खड़ा है, जहां एक ओर आवारा और संदिग्ध जानवरों का खतरा मौजूद है, दूसरी ओर अस्पतालों में जीवनरक्षक वैक्सीन नहीं है। लोग भयभीत हैं, मरीज परेशान हैं और परिजन चिंतित हैं। हर नया पशु काटने का मामला लोगों के मन में यह डर पैदा कर रहा है कि कहीं इलाज के अभाव में एक साधारण-सी घटना जानलेवा साबित न हो जाए। ऐसे में जरूरत केवल वैक्सीन की आपूर्ति की नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही तय करने की भी है, ताकि भविष्य में किसी व्यक्ति की जिंदगी दवा की कमी और प्रशासनिक लापरवाही की भेंट न चढ़े।

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