रजिस्ट्री ठप या कातिबों का कारोबार? पेपरलेस व्यवस्था के खिलाफ छौड़ादानो में मोर्चाबंदी

  • पेपरलेस रजिस्ट्री से छौड़ादानो में जमीन की खरीद-बिक्री पर ब्रेक, कातिबों का विरोध; व्यवस्था पर उठे सवाल
  • 17 अगस्त के बाद महज सात निबंधन का दावा, पहले रोजाना 50-70 रजिस्ट्री का हवाला; रोजगार का संकट बता रहे कातिब, नई व्यवस्था की खामियों के साथ उनकी भूमिका की जांच की भी उठी मांग

छौड़ादानो। बीते 17 अगस्त से लागू पेपरलेस निबंधन व्यवस्था को लेकर छौड़ादानो अवर निबंधन कार्यालय में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। नई व्यवस्था लागू होने के बाद जमीन की खरीद-बिक्री और निबंधन कार्य में भारी गिरावट का दावा किया जा रहा है। कातिब संघ का कहना है कि जहां पहले प्रतिदिन 50 से 70 दस्तावेजों का निबंधन होता था, वहीं नई व्यवस्था लागू होने के बाद 17 अगस्त से अब तक महज सात निबंधन ही हो सके हैं। हालांकि, इस दावे के बीच कातिबों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। कातिब संघ के अध्यक्ष पारसनाथ प्रसाद की अध्यक्षता में सोमवार को दस्तावेज लेखकों की बैठक हुई। बैठक में नई व्यवस्था को हटाकर पुरानी निबंधन प्रणाली बहाल करने की मांग की गई। संघ का कहना है कि पेपरलेस व्यवस्था में निबंधन कराने वाले पक्षकारों का दस्तखत नहीं होता है, जिससे आम लोगों में असमंजस की स्थिति है और वे जमीन की रजिस्ट्री कराने से कतरा रहे हैं।

रजिस्ट्री कम होने से रोजगार का संकट या पुरानी व्यवस्था की वापसी की चिंता?

नई व्यवस्था के खिलाफ कातिबों के आंदोलन और बैठक के बाद एक दूसरा सवाल भी चर्चा में है कि क्या निबंधन प्रक्रिया में तकनीकी बदलाव से आम लोगों को परेशानी हो रही है या दस्तावेज लेखकों को अपनी पुरानी कार्यप्रणाली और आय का नुकसान होने की चिंता है? कातिबों का कहना है कि नई व्यवस्था के कारण उनका काम लगभग ठप हो गया है और उनके सामने आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है। दूसरी ओर, पेपरलेस व्यवस्था को लेकर यह भी सवाल उठ रहा है कि यदि नई प्रणाली आम लोगों के लिए अधिक पारदर्शी और डिजिटल सुविधा देने के उद्देश्य से लागू की गई है, तो इसके संचालन में आ रही व्यावहारिक दिक्कतों को दूर करने के बजाय इसे पूरी तरह पुरानी व्यवस्था से जोड़कर देखना कितना उचित है।

सरकारी राजस्व पर भी असर का दावा

दस्तावेज लेखकों का कहना है कि निबंधन की संख्या में भारी कमी आने से सरकार को भी राजस्व का नुकसान हो रहा है। पहले जहां प्रतिदिन दर्जनों जमीनों का निबंधन होता था, वहीं अब निबंधन की संख्या में कथित तौर पर भारी गिरावट आई है। ऐसे में सरकार के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ नई डिजिटल व्यवस्था को सुचारु रूप से लागू करना और दूसरी तरफ आम लोगों के साथ-साथ निबंधन से जुड़े पेशेवरों की समस्याओं का समाधान करना। कातिब संघ के अध्यक्ष पारसनाथ प्रसाद ने कहा कि नई व्यवस्था लागू होने से पहले छौड़ादानो निबंधन कार्यालय में प्रत्येक कार्य दिवस 50 से 70 जमीनों की रजिस्ट्री होती थी। लेकिन 17 अगस्त के बाद से अब तक मात्र सात निबंधन होने की बात उन्होंने कही। उन्होंने सरकार से पुरानी व्यवस्था को पुनः बहाल करने की मांग की।

कातिबों की मांग पर भी हो पारदर्शी समीक्षा

वहीं, इस पूरे मामले में यह भी जरूरी है कि प्रशासन निबंधन कार्यालय में जमीन की रजिस्ट्री घटने के वास्तविक कारणों की निष्पक्ष समीक्षा करे। अगर पेपरलेस व्यवस्था में तकनीकी या व्यवहारिक खामियां हैं तो उन्हें दूर किया जाए, लेकिन अगर व्यवस्था के विरोध के पीछे कातिबों के पारंपरिक काम और आय को बचाने की चिंता है तो उस पहलू की भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। आम लोगों के लिए निबंधन प्रक्रिया सरल, सुरक्षित, पारदर्शी और कम खर्चीली होनी चाहिए। इसके साथ ही दस्तावेज लेखकों की वैध भूमिका और रोजगार से जुड़ी समस्याओं का भी उचित समाधान आवश्यक है। ऐसे में पुरानी व्यवस्था को सीधे बहाल करने की मांग के बजाय प्रशासन द्वारा नई व्यवस्था की खामियों, कातिबों की भूमिका और आम लोगों की वास्तविक परेशानियों की संयुक्त समीक्षा करना अधिक प्रभावी समाधान हो सकता है। बैठक में बिहार दस्तावेज नवीस संघ के मंत्री प्रमोद कुमार, कामेश्वर तिवारी, शेख सम्मीउल्लाह, जैनुल आबेदीन, रमेश कुमार, सुरेश प्रसाद सिंह, विश्वजीत सिंह, चुन्नू प्रसाद, सुरेश कुमार, अभय कुमार सहित कई दस्तावेज लेखक मौजूद रहे।

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