- मां की ममता को क्यों नहीं समझ पा रही नई पीढ़ी?
- रिश्तों को झकझोरती हरसिद्धि की घटना, सवाल सिर्फ एक हत्या का नहीं… बदलती संवेदनाओं का भी है
हरसिद्धि। मां… यह शब्द जितना छोटा है, उसका अर्थ उतना ही विराट। मां वह है जो संतान के जन्म से पहले नौ महीने तक उसे अपने गर्भ में पालती है और जन्म के बाद पूरी जिंदगी उसकी खुशियों के लिए खुद को भूल जाती है। उसकी नींद बच्चों की नींद में, उसकी खुशी बच्चों की मुस्कान में और उसकी उम्मीद बच्चों के भविष्य में बसती है। लेकिन जब वही संतान मां की जिंदगी की दुश्मन बन जाए, तो सवाल सिर्फ एक परिवार पर नहीं उठता, बल्कि पूरे समाज की संवेदनशीलता पर खड़ा हो जाता है। हरसिद्धि थाना क्षेत्र के गड़ूपुर सरेह में एक महिला की गला रेतकर हत्या की घटना ने रिश्तों की नींव तक को हिला दिया है। पुलिस की जांच में महिला के पुत्र पर हत्या का आरोप सामने आया है। हालांकि किसी भी आरोपी को दोषी ठहराने का अंतिम अधिकार न्यायालय का है, लेकिन बेटे पर मां की हत्या का आरोप सामने आना ही समाज के लिए बेहद पीड़ादायक और चिंताजनक है। जिस मां ने अपने बच्चे को जन्म दिया, जिसने उसके रोने पर रातों की नींद त्याग दी, जिसने बीमारी में उसके सिरहाने बैठकर दुआ की, जिसने उसके भविष्य के लिए अपनी इच्छाओं को कुर्बान किया—अगर उसी मां की जिंदगी पर उसकी संतान का हाथ उठने लगे तो इससे बड़ा पारिवारिक और सामाजिक विडंबना क्या हो सकती है?
जिसने खुद भूखी रहकर बच्चों को खिलाया, वही मां आज क्यों असुरक्षित है?
मां की जिंदगी त्याग की ऐसी कहानी है, जिसका कोई हिसाब नहीं होता। बच्चा बीमार पड़े तो मां बेचैन होती है। बच्चा देर से घर आए तो मां दरवाजे पर नजरें टिकाए रहती है। बच्चे के पास अच्छे कपड़े हों, इसके लिए वह अपने कपड़े पुराने होने देती है। बच्चे की फीस भरने के लिए वह अपनी जरूरतें टाल देती है। घर में भोजन कम हो तो मां अक्सर अपना हिस्सा छोड़ देती है। वह बच्चों को सिर्फ पालती नहीं, बल्कि उन्हें जिंदगी जीना सिखाती है। गिरने पर उठाती है, हारने पर हौसला देती है और अंधेरे समय में उम्मीद की रोशनी बनती है। लेकिन आज सवाल यह है कि जिस मां ने संतान को जिंदगी दी, उसकी जिंदगी की कीमत इतनी कम कैसे हो गई?
आधुनिकता के दौर में रिश्तों की गर्माहट क्यों ठंडी पड़ रही है?
बदलते समय के साथ नई पीढ़ी की सोच बदली है। स्वतंत्रता, व्यक्तिगत निर्णय और अपने जीवन को अपनी शर्तों पर जीने की चाह स्वाभाविक है। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ रिश्तों से मुंह मोड़ना नहीं हो सकता। माता-पिता और बच्चों के बीच विचारों का अंतर हो सकता है। पसंद अलग हो सकती है। जीवन के फैसलों को लेकर मतभेद हो सकते हैं। लेकिन इन मतभेदों का समाधान हिंसा नहीं है। समाधान है—संवाद। बच्चों को समझना होगा कि माता-पिता हर फैसले के विरोधी नहीं होते। कई बार उनकी सख्ती के पीछे चिंता होती है, उनके सवालों के पीछे सुरक्षा की भावना होती है और उनकी रोक-टोक के पीछे वर्षों का अनुभव। वहीं माता-पिता को भी समझना होगा कि आज की पीढ़ी के सपने, सोच और चुनौतियां पहले जैसी नहीं हैं। बच्चों की बात सुनना, उनकी भावनाओं को समझना और भरोसे का माहौल बनाना भी उतना ही जरूरी है।
प्रेम अपराध नहीं, लेकिन अपनों को तोड़ देना भी समाधान नहीं
समाज में ऐसी घटनाएं भी सामने आती हैं, जब युवा बेटियां प्रेम संबंधों या अपने फैसलों के कारण घर छोड़ देती हैं। किसी व्यक्ति को अपने जीवनसाथी के चयन और जीवन के फैसले का अधिकार है। लेकिन कोई भी निर्णय लेने से पहले यह सोचना भी जरूरी है कि उस फैसले से माता-पिता पर क्या बीतेगी। जिस बेटी के जन्म पर पिता ने मिठाई बांटी, जिस मां ने उसे अपने हाथों से बड़ा किया, उसकी विदाई के सपने देखे—जब वही बेटी अचानक बिना बताए घर छोड़ देती है तो माता-पिता के लिए वह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि भावनात्मक आघात बन जाती है। फैसले अपने हो सकते हैं, लेकिन रिश्तों की भावनाएं भी अपनी होती हैं। इसलिए जरूरत किसी की स्वतंत्रता छीनने की नहीं, बल्कि परिवारों में इतना संवाद पैदा करने की है कि बच्चे अपने जीवन के बड़े फैसले माता-पिता से छिपाकर नहीं, उन्हें विश्वास में लेकर कर सकें।
मां के त्याग का कोई हिसाब नहीं
लोककथाओं में मां की ममता और त्याग को लेकर अनेक कथाएं मिलती हैं। ऐसी ही एक चर्चित कथा में प्रेमिका के कहने पर बेटा अपनी मां से उसका कलेजा मांग बैठता है। मां अपने बेटे के लिए अपना जीवन तक न्योछावर कर देती है। यह कथा भले ही काल्पनिक हो, लेकिन उसका संदेश बेहद गहरा है—मां की ममता संतान के प्रति अंतिम सांस तक कम नहीं होती। यही मां है जो संतान की गलतियों को भी कई बार माफ कर देती है। यही मां है जो बेटे-बेटी के नाराज होने के बाद भी उनके लौटने का इंतजार करती है। यही मां है जो संतान से दूर होकर भी उसकी सलामती की दुआ करती है। फिर आखिर वह कौन-सी संवेदनहीनता है, जो संतान को उसी मां के खिलाफ खड़ा कर देती है?
सिर्फ कानून नहीं, संस्कार भी जरूरी
हर अपराध के बाद कानून अपना काम करता है। पुलिस जांच करती है, आरोपी की गिरफ्तारी होती है और न्यायालय साक्ष्यों के आधार पर फैसला करता है। दोष सिद्ध होने पर सजा भी मिलती है। लेकिन क्या सिर्फ सजा से समाज में ऐसी घटनाएं रुक जाएंगी? शायद नहीं। क्योंकि कानून अपराध होने के बाद सक्रिय होता है, जबकि संस्कार अपराध होने से पहले रोकने की ताकत रखते हैं। बच्चों को बचपन से यह सिखाना होगा कि माता-पिता से असहमति अपराध नहीं, लेकिन उनके प्रति हिंसा और अपमान किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं। वहीं माता-पिता को भी बच्चों के साथ ऐसा रिश्ता बनाना होगा, जिसमें डर नहीं बल्कि भरोसा हो।
घर की दीवारें ऊंची नहीं, दिलों के दरवाजे खुले होने चाहिए
आज जरूरत इस बात की है कि परिवारों में बातचीत बढ़े। बच्चे अपनी परेशानी माता-पिता से कह सकें। माता-पिता बच्चों की बात बिना डांट-फटकार के सुन सकें। क्योंकि कई बार रिश्ते किसी एक बड़ी घटना से नहीं टूटते। वे छोटी-छोटी उपेक्षाओं, गलतफहमियों, अविश्वास और संवाद की कमी से धीरे-धीरे कमजोर होते जाते हैं। जब तक परिवार के भीतर संवाद जिंदा रहेगा, तब तक रिश्तों में दरार को समय रहते भरा जा सकता है।
मां को सिर्फ मदर्स डे पर नहीं, हर दिन समझने की जरूरत
मां को सम्मान देने के लिए किसी एक दिन की जरूरत नहीं। मां के त्याग को समझने के लिए किसी समारोह की जरूरत नहीं। जरूरत सिर्फ इतनी है कि जब मां आवाज दे तो उसकी बात सुन ली जाए। जब वह परेशान हो तो उसके पास बैठ लिया जाए। जब वह बूढ़ी हो जाए तो उसके हाथ को उसी तरह थाम लिया जाए, जैसे उसने बचपन में हमारी उंगली थामी थी। जिस मां ने बचपन में हमें गिरने नहीं दिया, क्या हमारा फर्ज नहीं कि उसके बुढ़ापे में उसे अकेला न छोड़ें? हरसिद्धि की घटना एक परिवार की पीड़ा जरूर है, लेकिन यह पूरे समाज के लिए एक चेतावनी भी है। आज सवाल सिर्फ यह नहीं कि अपराध किसने किया। सवाल यह भी है कि हमारी पीढ़ियां उस मुकाम तक कैसे पहुंच रही हैं, जहां जन्म देने वाली मां के त्याग और ममता की कीमत भी छोटी पड़ने लगी है? मां ममता का सागर है। उसके त्याग की कोई कीमत नहीं, उसके प्रेम की कोई सीमा नहीं और उसकी दुआ का कोई विकल्प नहीं। रिश्ते खून से बनते हैं, लेकिन उन्हें जिंदा रखने के लिए संवेदना चाहिए।
मां को समझिए, उसकी भावनाओं को समझिए—क्योंकि मां चली जाए तो दुनिया में बहुत कुछ मिल सकता है, लेकिन मां दोबारा नहीं मिलती।