- चकिया में पकड़, तुरकौलिया में केस! 24.91 लाख कांड में कथित रिश्वत, दलालों की भूमिका और अधिकारियों पर EOU की टेढ़ी नजर
मोतिहारी/दिव्यांशु रमन सिंह
मोतिहारी। पूर्वी चंपारण का चर्चित 24 लाख 91 हजार 300 रुपये बरामदगी कांड अब एक साधारण पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गया है। बीते एक महीने से जिले से लेकर पटना तक चर्चा में रहे इस मामले ने अब पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली, जवाबदेही और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले में पहली बड़ी कार्रवाई करते हुए पुलिस अधीक्षक स्वर्ण प्रभात ने तुरकौलिया थानाध्यक्ष सम्पत कुमार को निलंबित कर दिया है। प्रशिक्षु डीएसपी ऋषभ कुमार की जांच रिपोर्ट के आधार पर हुई इस कार्रवाई में थानाध्यक्ष पर संदिग्ध आचरण और प्राथमिकी में तथ्यों को कथित रूप से तोड़-मरोड़ कर दर्ज करने के आरोप लगाए गए हैं। थानाध्यक्ष के निलंबन के साथ ही यह स्पष्ट संकेत मिल गया है कि पुलिस मुख्यालय और जिला पुलिस इस मामले को बेहद गंभीरता से ले रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि यह कार्रवाई केवल शुरुआत है और जांच आगे बढ़ने के साथ कई अन्य अधिकारियों और कर्मियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
चकिया टोल प्लाजा से शुरू हुई पूरी कहानी
पूरा मामला 25 मई 2026 की देर रात का बताया जाता है। चकिया टोल प्लाजा के पास वाहन जांच अभियान के दौरान पुलिस ने एक संदिग्ध कार को रोका। तलाशी के दौरान कार की डिक्की में बनाए गए एक विशेष गुप्त तहखाने से 24 लाख 91 हजार 300 रुपये नकद बरामद किए गए। इतनी बड़ी नकदी मिलने के बाद पुलिस ने मौके से चार लोगों को हिरासत में लिया। गिरफ्तार लोगों में आदापुर निवासी कृष्णा सहनी, नकरदेई निवासी सुभाष कुमार तथा नेपाल के बारा जिला निवासी दीपेश कुमार यादव और प्रज्ज्वल सहनी शामिल बताए गए। शुरुआती तौर पर इसे बड़ी पुलिस सफलता के रूप में देखा गया। लेकिन अगले कुछ दिनों में घटनाक्रम ने ऐसा मोड़ लिया कि पूरा मामला विवादों में घिर गया।
चकिया में पकड़, फिर तुरकौलिया में केस—यहीं से शुरू हुआ विवाद
मामले को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि जिस वाहन को चकिया क्षेत्र में पकड़ा गया था, आखिर उसे बाद में तुरकौलिया थाना क्षेत्र से क्यों जोड़ा गया? स्थानीय स्तर पर चर्चा होने लगी कि बरामदगी एक थाना क्षेत्र में हुई और प्राथमिकी दूसरे थाना क्षेत्र में दर्ज की गई। सूत्रों का दावा है कि बरामदगी के बाद तत्काल प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। आरोप है कि लगभग तीन दिनों तक मामला लंबित रहा और 28 मई को जाकर प्राथमिकी दर्ज की गई। इसी देरी ने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला दिया। लोग पूछने लगे कि यदि बरामदगी इतनी बड़ी थी तो एफआईआर दर्ज करने में तीन दिन क्यों लगे?
तीन दिनों में क्या हुआ? यही बन गया सबसे बड़ा सवाल
बरामदगी और प्राथमिकी के बीच का समय अब पूरे मामले की जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि इसी दौरान कथित रूप से कई स्तरों पर बातचीत, दबाव और सौदेबाजी का दौर चला। आवेदन में आरोप लगाया गया कि गिरफ्तार लोगों को राहत दिलाने, कार्रवाई को प्रभावित करने और मामले को कमजोर करने के नाम पर बड़ी रकम की मांग की गई। शिकायत में 35 लाख रुपये तक की कथित रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया है। वहीं जिले में यह चर्चा भी जोर पकड़ती रही कि कथित तौर पर 39 लाख रुपये तक की डील हुई थी। हालांकि इन आरोपों की किसी जांच एजेंसी ने अब तक पुष्टि नहीं की है। लेकिन शिकायतों और चर्चाओं के कारण मामला लगातार सुर्खियों में बना रहा।
दलालों की एंट्री और बढ़ा विवाद
मामले में कुछ कथित बिचौलियों के नाम भी सामने आए। शिकायतों और स्थानीय चर्चाओं में शर्मा और इरफान नामक व्यक्तियों का उल्लेख किया गया। आरोप है कि ये लोग कथित रूप से मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे थे और संबंधित पक्षों तथा प्रभावशाली लोगों के बीच संपर्क स्थापित कर रहे थे।कुछ लोगों का दावा है कि ये बिचौलिये अधिकारियों तक पहुंच होने का भरोसा दिलाते थे और विभिन्न मामलों में ‘सेटिंग’ कराने का दावा करते थे। हालांकि इन सभी आरोपों की जांच जारी है और अभी तक किसी भी व्यक्ति की भूमिका आधिकारिक रूप से सिद्ध नहीं हुई है।
डीजीपी तक पहुंची शिकायत, मुख्यालय में मचा हड़कंप
मामला उस समय और गंभीर हो गया जब शिकायत सीधे बिहार के पुलिस महानिदेशक विनय कुमार तक पहुंची। शिकायत में कथित रिश्वतखोरी, प्राथमिकी दर्ज करने में अनियमितता, अवैध वसूली और पुलिस कार्रवाई को प्रभावित करने के आरोप लगाए गए। सूत्रों के अनुसार शिकायत मिलने के बाद पुलिस मुख्यालय ने पूरे मामले को गंभीरता से लिया। विभागीय स्तर पर इसकी समीक्षा हुई और जांच के निर्देश जारी किए गए। यही वह मोड़ था जहां से मामला जिला स्तर से निकलकर राज्य स्तर की निगरानी में आ गया।
SP स्वर्ण प्रभात हुए एक्शन में
मामले की गंभीरता को देखते हुए पूर्वी चंपारण के एसपी स्वर्ण प्रभात ने भी जांच शुरू कराई। प्रशिक्षु डीएसपी ऋषभ कुमार को प्रारंभिक जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई। जांच के दौरान प्राथमिकी, जब्ती प्रक्रिया, संबंधित दस्तावेजों और पूरे घटनाक्रम की समीक्षा की गई। जांच रिपोर्ट में थानाध्यक्ष के संदिग्ध आचरण और प्राथमिकी में तथ्यों को कथित रूप से तोड़-मरोड़कर दर्ज करने की बात सामने आने के बाद एसपी ने तुरकौलिया थानाध्यक्ष सम्पत कुमार को निलंबित कर दिया। यह कार्रवाई पूरे मामले की पहली बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई मानी जा रही है।
EOU ने संभाली कमान
सूत्रों के अनुसार अब आर्थिक अपराध इकाई (EOU) भी पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही है। जांच एजेंसियां कॉल डिटेल रिकॉर्ड, मोबाइल लोकेशन, बैंक खातों के लेन-देन, डिजिटल ट्रांजैक्शन, व्हाट्सएप चैट, सीसीटीवी फुटेज, जब्ती सूची और केस डायरी की जांच कर रही हैं। जांच का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि बरामदगी के बाद प्राथमिकी दर्ज होने तक क्या-क्या हुआ, किसने हस्तक्षेप किया, क्या किसी स्तर पर कार्रवाई को प्रभावित करने की कोशिश हुई और शिकायतों में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है।
IPRD ने भी मांगी रिपोर्ट
मामले के लगातार चर्चा में रहने और मीडिया में खबरें आने के बाद सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (IPRD) द्वारा भी जिला प्रशासन से रिपोर्ट मांगे जाने की चर्चा है। इससे साफ संकेत मिलता है कि मामला राज्य स्तर पर गंभीरता से देखा जा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल
तुरकौलिया थानाध्यक्ष के निलंबन के बाद यह मामला एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। अब लोगों के बीच कई सवाल चर्चा का विषय बने हुए हैं—
- चकिया में पकड़ी गई गाड़ी का मामला तुरकौलिया तक कैसे पहुंचा?
- प्राथमिकी दर्ज करने में तीन दिन की देरी क्यों हुई?
- क्या वास्तव में किसी स्तर पर अवैध लेन-देन हुआ?
- शिकायतों में लगाए गए रिश्वत और वसूली के आरोपों में कितनी सच्चाई है?
- क्या जांच की आंच और बड़े अधिकारियों तक पहुंचेगी?
- और सबसे बड़ा सवाल—क्या यह केवल एक थानाध्यक्ष की गलती थी या फिर इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था?
इन सभी सवालों के जवाब अब EOU और जिला पुलिस की जांच रिपोर्ट के बाद ही सामने आएंगे। लेकिन इतना तय है कि 24.91 लाख रुपये की बरामदगी से शुरू हुआ यह मामला अब बिहार पुलिस की साख से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। थानाध्यक्ष पर हुई कार्रवाई ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि जांच आगे बढ़ रही है। अब पूरे बिहार की नजर इस बात पर टिकी है कि इस चर्चित 25 लाख कांड में अगली कार्रवाई किस पर होती है और आखिरकार इस पूरे मामले का सच क्या निकलकर सामने आता है।
