एमएलसी नहीं बने तो क्या हुआ? उपेंद्र ने कहा- मंत्री पद कहीं नहीं जा रहा

  • एमएलसी नहीं बने तो क्या हुआ? उपेंद्र ने कहा- मंत्री पद कहीं नहीं जा रहा

 

पटना/नई दिल्ली। बिहार की राजनीति में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के मंत्री पद को लेकर पिछले कुछ दिनों से जारी अटकलों पर राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने बड़ा बयान देकर विराम लगाने की कोशिश की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि दीपक प्रकाश को कुछ महीनों के लिए नहीं, बल्कि एनडीए सरकार के पूरे कार्यकाल तक मंत्री बनाए रखा जाएगा। कुशवाहा का यह बयान ऐसे समय आया है जब विपक्ष लगातार दीपक प्रकाश की संवैधानिक स्थिति और मंत्री पद के भविष्य को लेकर सवाल उठा रहा है। नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अधिवेशन के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि दीपक प्रकाश को मंत्री बनाने का निर्णय पूरी राजनीतिक समझ और व्यापक विचार-विमर्श के बाद लिया गया था। यह फैसला केवल उनकी पार्टी का नहीं बल्कि एनडीए के शीर्ष नेतृत्व और सभी सहयोगी दलों की सहमति से हुआ था। ऐसे में यह मान लेना कि उन्हें कुछ महीनों के लिए मंत्री बनाया गया है, पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा कि जब दीपक प्रकाश ने मंत्री पद की शपथ ली थी, तब भी वे विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं थे। इसके बावजूद उन्हें बिहार सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। इससे साफ है कि उन्हें किसी अस्थायी राजनीतिक व्यवस्था के तहत नहीं बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक योजना के तहत मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। उन्होंने दोहराया कि दीपक प्रकाश वर्ष 2030 तक मंत्री रहेंगे और एनडीए सरकार का पूरा कार्यकाल पूरा करेंगे। दरअसल, हाल ही में बिहार विधान परिषद चुनाव के दौरान भाजपा ने दीपक प्रकाश को एमएलसी उम्मीदवार नहीं बनाया था। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा शुरू हो गई थी कि यदि उन्हें छह महीने के भीतर किसी सदन की सदस्यता नहीं मिलती है तो संवैधानिक रूप से उनका मंत्री पद समाप्त हो सकता है। इस मुद्दे को लेकर विपक्षी दलों ने भी सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया था। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच भी यह सवाल उठने लगा था कि आखिर दीपक प्रकाश की सदस्यता का रास्ता क्या होगा और सरकार इस संवैधानिक चुनौती से कैसे निपटेगी। इसी बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी दीपक प्रकाश के मंत्री पद को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की थी। मुख्यमंत्री ने कहा था कि दीपक प्रकाश वर्तमान में मंत्री हैं और आगे भी बने रहेंगे। उन्होंने संविधान के प्रावधानों का हवाला देते हुए बताया था कि कोई भी व्यक्ति विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बने बिना भी निर्धारित अवधि तक मंत्री पद पर रह सकता है। मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद भी राजनीतिक चर्चाएं थमने का नाम नहीं ले रही थीं। उपेंद्र कुशवाहा के ताजा बयान को इसी राजनीतिक बहस का जवाब माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए रखने को लेकर एनडीए नेतृत्व पूरी तरह स्पष्ट है और इस मामले में किसी तरह की असमंजस की स्थिति नहीं है। उन्होंने विश्वास जताया कि संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप समय आने पर सभी आवश्यक कदम उठाए जाएंगे और उनकी सदस्यता का रास्ता भी निकाला जाएगा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दीपक प्रकाश का मामला केवल एक मंत्री पद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एनडीए की व्यापक राजनीतिक रणनीति से जुड़ा हुआ है। बिहार विधानसभा चुनाव को देखते हुए विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को साधने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में दीपक प्रकाश की भूमिका गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यही कारण है कि उनके मंत्री पद को लेकर एनडीए नेतृत्व किसी प्रकार का जोखिम लेने के मूड में नहीं दिख रहा। गौरतलब है कि दीपक प्रकाश ने 7 मई 2026 को बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री के रूप में शपथ ली थी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार यदि कोई व्यक्ति मंत्री नियुक्त होता है और वह किसी सदन का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना आवश्यक होता है। यदि वह निर्धारित अवधि में सदस्य नहीं बन पाता है तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है। यही वजह है कि आने वाले महीनों में दीपक प्रकाश की राजनीतिक यात्रा और उनकी सदस्यता को लेकर होने वाले घटनाक्रम पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी। विपक्ष जहां इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश करेगा, वहीं एनडीए के सामने संवैधानिक समयसीमा के भीतर समाधान निकालने की चुनौती होगी। फिलहाल उपेंद्र कुशवाहा के बयान ने इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि एनडीए नेतृत्व दीपक प्रकाश को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है और उन्हें सरकार में लंबे समय तक बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रहा है। अब देखना यह होगा कि राजनीतिक दावे और संवैधानिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाता है और दीपक प्रकाश को सदन की सदस्यता दिलाने के लिए कौन सा रास्ता चुना जाता है। बिहार की राजनीति में यह मुद्दा आने वाले दिनों में चर्चा का बड़ा केंद्र बना रह सकता है।

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