‘तेल चोर’ बयान पर प्रशांत किशोर को कोर्ट का समन, सांसद संजय जायसवाल की मानहानि याचिका ने बिहार की सियासत में मचाई हलचल

  • ‘तेल चोर’ बयान पर प्रशांत किशोर को कोर्ट का समन, सांसद संजय जायसवाल की मानहानि याचिका ने बिहार की सियासत में मचाई हलचल

बेतिया। बिहार की राजनीति में तीखे हमलों और आरोप-प्रत्यारोप की लड़ाई अब अदालत की चौखट तक पहुंच गई है। जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर को पश्चिम चंपारण से भाजपा सांसद संजय जयसवाल के खिलाफ कथित रूप से दिए गए विवादित बयानों के मामले में बड़ा कानूनी झटका लगा है। बेतिया स्थित मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी आनंद कुमार त्रिपाठी की अदालत ने सांसद संजय जायसवाल द्वारा दायर मानहानि परिवाद पर संज्ञान लेते हुए प्रशांत किशोर को नोटिस जारी कर अदालत में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने का आदेश दिया है। इस आदेश के बाद बिहार की राजनीतिक फिजा में नई बहस छिड़ गई है और मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। यह मामला उस विवाद से जुड़ा है जिसने वर्ष 2025 में पश्चिम चंपारण की राजनीति को गरमा दिया था। सांसद संजय जायसवाल ने अदालत में दायर परिवाद में आरोप लगाया है कि राजनीतिक लाभ हासिल करने और उनकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाने की नीयत से उनके खिलाफ सुनियोजित दुष्प्रचार अभियान चलाया गया। शिकायत के अनुसार, प्रशांत किशोर ने सार्वजनिक सभाओं, प्रेस कॉन्फ्रेंसों और सोशल मीडिया मंचों के जरिए यह आरोप लगाया कि बेतिया छावनी स्थित सांसद के पेट्रोल पंप को लाभ पहुंचाने के लिए छावनी ओवरब्रिज के एलाइनमेंट में बदलाव कराया गया। इसके साथ ही उन्हें “तेल चोर” जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया गया और भ्रष्टाचार के आरोपों से जोड़ने की कोशिश की गई। सांसद का आरोप है कि यह केवल राजनीतिक आलोचना नहीं थी, बल्कि उनकी व्यक्तिगत और राजनीतिक प्रतिष्ठा को धूमिल करने का एक संगठित प्रयास था। परिवाद में कहा गया है कि लगातार प्रेस वार्ताओं, सोशल मीडिया पोस्टों और पोस्टरों के माध्यम से ऐसे आरोपों को जनता के बीच प्रचारित किया गया, जिससे उनकी वर्षों की राजनीतिक साख को नुकसान पहुंचाने की कोशिश हुई। शिकायत में यह भी कहा गया है कि जनता के बीच भ्रम पैदा करने और राजनीतिक लाभ लेने के उद्देश्य से तथ्यों से परे जाकर आरोप लगाए गए। मामले को गंभीरता से लेते हुए सांसद संजय जायसवाल ने अदालत में परिवादी के रूप में अपना बयान शपथपूर्वक दर्ज कराया। इसके अलावा उनके समर्थन में दो गवाहों संजय कुमार सिंह और मनोज कुमार सिंह ने भी जांच साक्ष्य के रूप में अपने बयान दर्ज कराए। अदालत के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों, गवाहों के बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मामले की प्रारंभिक सुनवाई की गई। सुनवाई के दौरान सांसद पक्ष के अधिवक्ता अमरेंद्र वर्मा और चंद्रिका प्रसाद कुशवाहा ने अदालत में विस्तार से बहस करते हुए कहा कि लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार है, लेकिन किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने और बिना प्रमाण गंभीर आरोप लगाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि मामले में आरोपी को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया जाए। दोनों पक्षों के दस्तावेजों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने बीएनएसएस की धारा 223 के तहत प्रशांत किशोर को नोटिस जारी करने का आदेश दिया। अदालत के इस आदेश को बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हाल के वर्षों में बिहार की राजनीति में व्यक्तिगत आरोपों और तीखी बयानबाजी का चलन बढ़ा है, लेकिन यह मामला उस सीमा को पार करता दिख रहा है जहां राजनीतिक बयान अब कानूनी जांच के दायरे में पहुंच चुके हैं। अदालत द्वारा नोटिस जारी किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि आरोप सिद्ध हो गए हैं, लेकिन इतना जरूर है कि अदालत ने मामले को सुनवाई योग्य मानते हुए आरोपी पक्ष से जवाब मांगने की आवश्यकता महसूस की है। इस घटनाक्रम ने पश्चिम चंपारण समेत पूरे बिहार के राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है। भाजपा इसे राजनीतिक मर्यादा और जवाबदेही का मामला बता रही है, जबकि जन सुराज खेमे की नजर अब अदालत में होने वाली आगामी सुनवाई पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में प्रशांत किशोर को अदालत में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखना होगा, जिसके बाद मामले की दिशा और आगे की कानूनी प्रक्रिया तय होगी। बिहार की राजनीति में अक्सर आरोपों की बौछार देखने को मिलती है, लेकिन जब वही आरोप अदालत तक पहुंच जाएं तो उनका राजनीतिक और कानूनी महत्व कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे में सबकी निगाहें अब बेतिया की अदालत पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि राजनीतिक मंचों पर लगाए गए आरोपों का कानूनी भविष्य क्या होगा और इस बहुचर्चित विवाद का अगला अध्याय किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

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